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खाने-पीने की कहानियां : गोल रसीली जलेबी, गोल घूमती आई भारत, बनी स्वाद की रानी

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कई गोलाइयां लिए हुए ये ऐसी मिठाई है, जिसको हम जलेबी कहते हैं. जीभ पर रखते ही ये क्रिस्पी अंदाज में जो मीठा सा रस साथ में बिखेरती है, उससे जीभ आनंद के सागर में गोते लगाने लगती है. ये ऐसी मिठाई है, जिसको खाते हुए हम कभी नहीं अघाते. सोचिए ये मिठाई भारत में 600 सालों से कहीं पहले आई और अब तक उसी अंदाज में बन रही है और स्वाद की दुनिया में सुपरहिट है. इसकी अनूठे वक्रीय आकार और अनगढ़ गोलाइयां हैरान भी करती है कि ये आखिर कैसे बनी होगी.
ये भारतीय घरों में सदियों पुराना पसंदीदा नाश्ता है. हलवाई की कढ़ाई से चीनी चासनी में पगी गर्म गर्म जलेबी खाइए तो मजा ही आ जाएगा, लगेगा कि इससे बेहतर कुछ है ही नहीं. शादियों, पार्टियों और समारोहों में इसकी मौजूदगी करीब तय ही रहती है. वैसे इसका आकार गोलाई लिए चाहे जितना जटिल लगे लेकिन ये सच है कि इसको बनाना इतना मुश्किल भी नहीं. आसानी से आप भी इसको बना सकते हैं.आमतौर पर जलेबी मैदे, आटे और उड़द की दाल से बनाई जाती है. इसके बैटर को कुछ दही के साथ किण्डवित करने के लिए कुछ घंटे के लिए छोड़ा जाता है और फिर कपड़े की एक छेद वाली पोटली में इस किण्डवित घोल को लेकर तेल में गर्म कढ़ाही में गोल गोल घुमाया जाता है. वैसे बहुत सी जगहों पर जलेबी के बैटर को किण्डवित नहीं किया जाता, इसे ताजे घोल से ही तैयार किया जाता है.
क्या कभी आपने हलवाइयों को इसे बनाते देखा है. वो कड़ाही में एक के बाद हाथ घुमाते हुए ढेर सारी जलेबियों को आकार देते हैं. बैटर में गुलाब जल, केसर, इलायची, क्रीम डाल दें तो और भी अच्छा.
ये कड़ाही के गर्म तेल या घी में आते ही डीपफ्राई होना शुरू करती है और इस प्रक्रिया में पहले सफेद से पीलापन लेती है और फिर ज्यादा गर्म होते हुए क्रिस्पी नारंगी लाल रंग में बदल जाती है. बस इसी समय इसे कड़ाही से निकाला जाता है और चाशनी से भरे दूसरे बर्तन में डुबो दिया जाता है. कुछ ही मिनटों में इसकी अंदर से खाली क्रिस्पी शिराओं में चाशनी तो भरती ही है, साथ ही इसे बाहर से भी मीठे अंदाज सरोबोर कर देती है.लीजिए जलेबी तैयार है. और खाने में क्या यम्मी टेस्ट. वैसे अब इसके बैटर में अब अलग सामग्रियों के साथ भी प्रयोग होने लगे हैं.
जलेबी को खाने का मजा तभी है जबकि इसे गर्मागर्म खाए जाए. इसे जौ से बनाते हैं, आटे से भी और बेसन से भी. पहले तो आमतौर पर जौ और गुड़ से बनी जलेबियां ही प्रचलन में थीं. हालांकि जलेबी के बारे में कहते हैं कि 12 वीं शताब्दी या 13वीं शताब्दी में नादिर शाह इसे ईरान से लेकर आया. इसे तब जौलबिया या जिलेबिया कहा जाता था. भारत में लोकप्रिय होने के साथ इसे जलेबी कहा जाने लगा.
ये भी कहा जाता है कि यह व्यंजन तुर्की और फ़ारसी व्यापारियों और कारीगरों के साथ भारतीय तटों तक पहुँचा. जल्द ही उपमहाद्वीप के लोगों ने इसे अपना लिया. इसे जलेबी कहना शुरू कर दिया.
13वीं शताब्दी में तुर्की के मोहम्मद बिन हसन की किताब में इसके बनाने के बारे में लिखा है. 1450 में जैन धर्म की किताब कर्णप कथा में इसका जिक्र आया है. 1600 ईंस्वी में संस्कृत ग्रंथ गुण्यगुणाबोधिनी में इसे सुस्वादु व्यंजन के बारे में बताया गया है, जो गोल और रसभरी होती थी. 17वीं सदी में रघुनाथ ने अपनी पाक कला से संबंधित किताब भोजमा कौतुहल में जलेबी की तारीफ की है.
1450 ई. के आसपास, लेखक जिनासुर द्वारा रचित एक प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘ प्रियमकर्णपकथा’ में चर्चा की गई है कि कैसे जलेबी अमीर व्यापारियों और लोगों के बीच खूब चखा जाने वाला एक आम व्यंजन था.
गोल – गोल जलेबी में समय के साथ गोल-गोल घुमते हुए फैलती चली गई. मुगल शासकों की रसोई के बाद ये दिल्ली के हलवाइयों तक पहुंची और फिर हर मौहल्ले और कॉलोनी की मिठाई और नाश्ते की दुकानों तक. भारतीय जिस व्यंजन को रोज खूब खाते हैं और दिन की शुरुआत ही इससे करते हैं, उसमें एक जलेबी भी है. सुबह सुबह अक्सर इसीलिए हलवाइयों की दुकानें गुलजार रहती हैं. हालांकि गुजरात का दावा है कि जलेबी सबसे पहले उसके यहां बनी.
ईरान से भारत आए पारसी जब में नौरोज़ (फ़ारसी नव वर्ष) मनाते हैं तो जलेबी जरूर बनाते खाते हैं. हालांकि कहा जाता है कि ज़ुल्बिया का डिज़ाइन भारतीय जलेबी से कुछ अलग था.
कहीं जलेबी रबड़ी का कांबो हिट है तो कहीं कचौरी और जलेबी खासी लोकप्रिय. बिहार और बनारस में लोग पहले सुबह पूड़ी या कचौड़ी के साथ जीभ तर करते हैं और फिर जलेबियों का आनंद लेते हुए स्वाद के मधुर सागर में गोता लगाते हैं.
वैसे कहा जाता है कि दिल्ली के पुराने कुछ हलवाई ऐसे थे, जहां उनकी जलेबियों के लिए सुबह लंबी लाइनें लगतीं थीं. कोलकाता में लोग जलेबी और रबड़ी कांबो के दीवाने हैं. हरियाणा का गोहाना देश में सबसे अच्छे जलेबा बनाने के लिए जाना जाता है. जलेबा यानि बड़ी आक

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